डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति पद की शपथ लेने से पहले ही वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग को लेकर उनकी टिप्पणियों ने कीव से लेकर मॉस्को तक सबको उलझा रखा है। ट्रंप का दावा है कि वह 24 घंटे में युद्ध रुकवा सकते हैं। यह सुनने में जितना आसान लगता है, असल में उतना ही पेचीदा है। हालिया संकेतों को देखें तो ऐसा लगता है कि ट्रंप शायद बिना किसी ठोस लिखित समझौते के ही इस युद्ध के मैदान से हटने का मन बना रहे हैं।
यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के चेहरे पर तनाव साफ दिखता है। उन्हें डर है कि ट्रंप की जल्दबाजी यूक्रेन को झुकने पर मजबूर कर देगी। अमेरिकी सहायता के बिना यूक्रेन का टिकना लगभग नामुमकिन है। ट्रंप का रुख हमेशा से 'अमेरिका फर्स्ट' रहा है। वह यूक्रेन को अरबों डॉलर की मदद भेजने के खिलाफ रहे हैं। वह इसे अमेरिकी करदाताओं के पैसे की बर्बादी मानते हैं। जब वह कहते हैं कि वह युद्ध खत्म कर देंगे, तो उनका असली मतलब शायद यह है कि वह अमेरिका का हाथ पीछे खींच लेंगे।
युद्ध विराम की कोशिशें और रूस की चाल
पुतिन को अच्छी तरह पता है कि ट्रंप के आने से समीकरण बदलेंगे। रूस अभी युद्ध के मैदान में मजबूत स्थिति में है। उसने यूक्रेन के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया है। पुतिन किसी भी ऐसे समझौते पर दस्तखत नहीं करेंगे जो उन्हें जीते हुए इलाके वापस करने को कहे। ट्रंप का 'पीस प्लान' दरअसल एक तरह का युद्ध विराम हो सकता है जहां जो फौज जहां खड़ी है, वहीं रुक जाए। इसे 'फ्रोजन कॉन्फ्लिक्ट' कहते हैं।
यूक्रेन के लिए यह किसी हार से कम नहीं होगा। वे अपनी जमीन खो देंगे और नाटो की सदस्यता का सपना भी टूट जाएगा। ट्रंप की टीम से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, वे यूक्रेन को कम से कम 20 साल तक नाटो से दूर रखने का प्रस्ताव दे सकते हैं। बदले में अमेरिका उन्हें हथियार देता रहेगा ताकि रूस दोबारा हमला न करे। पर सवाल यह है कि क्या पुतिन को अमेरिका के वादे पर भरोसा है? या क्या यूक्रेन को अमेरिका पर यकीन है?
ट्रंप का एग्जिट प्लान और यूरोप का डर
यूरोप के देश इस वक्त सबसे ज्यादा डरे हुए हैं। अगर अमेरिका पीछे हटता है, तो रूस का अगला निशाना कौन होगा? पोलैंड और बाल्टिक देश रात भर सो नहीं पा रहे। ट्रंप ने बार-बार कहा है कि यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा का खर्चा खुद उठाना चाहिए। वह नाटो को एक बोझ की तरह देखते हैं।
हकीकत यह है कि ट्रंप कोई मंझे हुए कूटनीतिज्ञ नहीं हैं। वह एक डीलम मेकर हैं। वह व्यापारिक नजरिए से चीजों को देखते हैं। अगर उन्हें लगता है कि इस युद्ध में निवेश करने से अमेरिका को कोई फायदा नहीं है, तो वह बस इससे बाहर निकल जाएंगे। उनके लिए जीत का मतलब शांति समझौता नहीं, बल्कि अमेरिकी खर्च का बंद होना है। वह युद्ध के मैदान को बिना किसी औपचारिक समझौते के भी छोड़ सकते हैं, बशर्ते वह अपने समर्थकों को यह समझा सकें कि उन्होंने अमेरिका का पैसा बचा लिया।
यूक्रेन की मजबूरियां और जेलेंस्की का दांव
जेलेंस्की के पास विकल्प कम होते जा रहे हैं। वे जानते हैं कि अगर ट्रंप ने सप्लाई लाइन काट दी, तो कीव का पतन तय है। इसलिए वे ट्रंप को रिझाने की कोशिश कर रहे हैं। वे इसे 'शांति के जरिए ताकत' का नाम दे रहे हैं। लेकिन ट्रंप को शब्दों से ज्यादा नंबरों में दिलचस्पी है।
रूस की अर्थव्यवस्था पर लगे प्रतिबंधों का भी ट्रंप पर कोई खास असर नहीं पड़ता। वह शायद इन्हें हटाने का सौदा भी कर लें अगर पुतिन चीन से अपनी नजदीकियां कम करने को तैयार हो जाएं। यह एक खतरनाक खेल है। ट्रंप को लगता है कि वह पुतिन को कंट्रोल कर सकते हैं, जबकि पुतिन को लगता है कि वह ट्रंप का इस्तेमाल कर सकते हैं।
समझौते के बिना शांति की कीमत
बिना किसी ठोस समझौते के युद्ध रुकने का मतलब है एक अस्थायी शांति। यह वैसी ही स्थिति होगी जैसी उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच है। दशकों से वहां कोई आधिकारिक शांति समझौता नहीं है, बस एक लकीर है जिसे कोई पार नहीं करता। ट्रंप शायद यूक्रेन में भी यही मॉडल चाहते हैं।
इसमें सबसे बड़ा नुकसान अंतरराष्ट्रीय कानूनों का होगा। अगर रूस जमीन कब्जा कर वहां बना रहता है, तो यह दुनिया के लिए एक संदेश होगा कि ताकत के दम पर सीमाएं बदली जा सकती हैं। ट्रंप को शायद इसकी परवाह नहीं है। उनके लिए वैश्विक व्यवस्था बनाए रखने से ज्यादा जरूरी अपनी लोकप्रियता और घरेलू वादे हैं।
यूक्रेन के लोग इस वक्त अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ राजनीति नहीं, अस्तित्व की लड़ाई है। ट्रंप का 'पीस प्लान' उनके लिए एक कड़वी गोली की तरह है जिसे निगलना उनके लिए लगभग असंभव होगा। लेकिन बिना अमेरिकी मदद के उनके पास लड़ने की ताकत भी नहीं बचेगी।
रूस के बढ़ते हौसलों को रोकना अब सिर्फ यूक्रेन के बस की बात नहीं रही। अगर ट्रंप ने वाकई मैदान छोड़ दिया, तो यूरोप का नक्शा हमेशा के लिए बदल सकता है। यह सिर्फ एक युद्ध का अंत नहीं होगा, बल्कि अमेरिकी प्रभुत्व के एक दौर का भी अंत हो सकता है।
अब समय आ गया है कि यूक्रेन और यूरोपीय देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता कम करें। उन्हें अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ानी होगी और खुद के गठजोड़ मजबूत करने होंगे। ट्रंप का संदेश साफ है कि अब हर देश को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी। कीव को चाहिए कि वे ट्रंप के औपचारिक कार्यभार संभालने से पहले अपनी रक्षा पंक्तियों को जितना हो सके मजबूत कर लें और वैकल्पिक हथियारों की सप्लाई सुनिश्चित करें।